Thursday, 26 April 2018

ऑपरेशन 136




The operation literally gave us video evidence of media houses being sold out to serve the ruling party's interests and the consequences of this are as big as IT cells and fake news. Why aren't we as a country discussing this more?
I understand that nobody registered an FIR for this to be investigated and that the accused media houses themselves wouldn't do anything about it, but the discussion on social media has been really muted.


नई दिल्ली। देश के क़ानून एवं न्याय, सूचना और तकनीक मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने 21 मार्च 2018 को ट्वीट किया, “हम बोलने की आज़ादी और सोशल मीडिया पर खुले विचारों के सम्प्रेषण का समर्थन करते हैं लेकिन सोशल मीडिया का दुरुपयोग कर अवांछनीय तरीके से चुनावों को प्रभावित करने के प्रयासों को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा”।  कुछ इसी तरह की सच्चाई कोबरापोस्ट की तहकीकत ऑपरेशन 136 दर्शाती है जिसमें कई भारतीय मीडिया हाउस पैसे के बदले कंटैंट से समझौता करने के लिए तैयार दिखे फिर चाहे बात इलैक्शन के दौरान हिन्दुत्व का प्रचार या फिर ध्रुवीकरण की हो। हर चीज़ के लिए इन मीडिया प्रतिष्ठानों के लोग सहमत हो गए। वरिष्ठ पत्रकार पुष्प शर्मा की तहकीकत के दौरान इन तमाम मुद्दों पर मीडिया प्रतिष्ठान जिसमे प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल जैसे प्लैट्फॉर्म के ऊंचे पदों पर बैठे लोग न सिर्फ तैयार थे बल्कि मोटी रकम के बदले इस सुनियोजित योजना को जोकि एक खुल्लमखुल्ला साम्प्रदायिक मीडिया कैम्पेन था, को चलाने और सफल बनाने के लिए सैकड़ों रास्ते भी बताए।


Print Coverage -

http://thewirehindi.com/38449/cobra-post-operation-136-alleges-paid-news-agenda-by-indian-media/

https://www.boomlive.in/peddling-hindutva-for-money-cobrapost-stings-media-houses-in-operation-136/

https://www.newslaundry.com/2018/03/27/cobrapost-expose-hindutva-dainik-jagran-india-tv

http://www.thehindu.com/news/national/cobrapost-says-paid-news-widespread/article23357752.ece

http://hindi.catchnews.com/india/cobrapost-sting-operation-136-17-media-houses-ready-to-polarize-voters-for-money-104947.html

https://www.outlookhindi.com/politics/general/congress-president-rahul-gandhi-tweet-on-operation-136-done-by-cobrapost-25590

http://www.business-standard.com/article/current-affairs/sting-shows-some-media-houses-ready-to-polarise-voters-on-hindutva-for-cash-118032600837_1.html



Videos -

https://www.youtube.com/watch?v=6zx-TpcdyZo

https://www.youtube.com/watch?v=-qu9Jgvq3B4

https://www.youtube.com/watch?v=96ElzY1HYQs



Sunday, 29 October 2017

पत्रकारिता= भक्ति और सेल्फ़ी काल

एक चैनल कहता हैः सच के लिए सा... कुछ भी करेगा और 'सच' के लिए सचमुच 'कुछ भी' करता रहता है. दूसरे ने अपना नाम ही 'नेशन' रख लिया है और किसी जिद्दी बालक की तरह हर वक्त ज़ोर-ज़ोर से चींखता रहता हैः 'नेशन वांट्स टू नो! नेशन वांट्स टू नो!'

बात-बात पर कहने लगता है हमारे पास हैं कठोर सवाल! एक से एक कठिन सवाल! है कोई माई का लाल जो दे सके कठोर सवालों का जबाव? कहां हैं राहुल? कहां हैं सोनिया? कहां हैं शशि! वो आके क्यों नहीं देते हमारे कठोर सवालों के जबाव?
तीसरे ने अपने आप को गणतंत्र ही घोषित कर रखा है! इस गणतंत्र में एक आदमी रहता है जिसका पुण्य कर्तव्य है कि वह हर समय कांग्रेस के कपड़े उतारता-फाड़ता रहे!
चौथा कहता रहता है कि सच सिर्फ अपने यहां मिलता है और तौल में मिलता है-पांच दस, पचास ग्राम से लेकर एक टन दो टन तक मिलता है हर साइज़ की सच की पुड़िया हमारे पास है!

पांचवें चैनल का एक एंकर देश को बचाने के लिए स्टूडियो में नकली बुलेट प्रूफ़ जैकेट पहने दहाड़ता रहता है-पता नहीं कब दुष्ट पाकिस्तान गोली चला दे और सीधे स्टूडियो में आकर लगे! उसे यकीन है कि बुलेट प्रूफ़ जैकेट उसे अवश्य बचा लेगी!
अपने यहां ऐसे ही चैनल हैं बहादुरी में सब एक से एक बढकर एक हैं- ऐसे वीरगाथा काल में दीपावली मिलन का अवसर आया! एक से एक वीर बहादुर पत्रकार लाइन लगा कर कुर्सियों पर बैठ गए.
मैं सोचता रहा कि जब भाषण खत्म होगा तो अपना मीडिया और उसके प्रतिनिधि पत्रकार कुछ सवाल ज़रूर करेंगे और कठोर सवाल करने वाले चैनल का रिपोर्टर तो ज़रूर ही करेगा!
पूछेगा कि 'सर जी! कल ही एक पत्रकार सिर्फ 'सेक्सी सीडी' रखने के 'अपराध' गिरफ्तार किया गया है? वो कह रहा है कि उसे फंसाया गया है- इस बारे में आपकी क्या राय है? क्या यही है अभिव्यक्ति की आजादी?'

लेकिन कठोर सवाल करने वाले ने तो सवाल किया ही नहीं किसी और ने भी नहीं किया! एक पत्रकार गिरफ्तार और ख़ामोश रहे अपने रण बांकुरे पत्रकार! सब के सब 'हिज़ मास्टर्स वायस' हो गए!
आपातकाल के दौर की पत्रकारिता के बारे में आडवाणी जी ने कभी कहा था 'उनसे झुकने को कहा गया वो तो रेंगने लगे'- न आपातकाल है न कुछ और लेकिन इन दिनों तो सारे वीर बहादुर पत्रकार साष्टांग दंडवत करते दिखते हैं!
यह पत्रकारिता का भक्तिकाल है- लगता है कि पत्रकारों के पास कलम की जगह घंटी आ गई है जिसे वो हर समय बजाते रहते हैं और अपने इष्टदेव की आरती उतारते रहते हैं!
कोई राम मंदिर बनवाता रहता है- कोई देश को किसी अनजाने शत्रु से बचाता रहता है- कोई पाकिस्तान को न्यूक करने की सलाह देता रहता है- कोई राहुल की खिल्ली उड़ाता रहता है- कोई ताजमहल पर ही सवाल उठवाता रहता है कि ये ताजमहल है कि तेजो महालय?

अपने मीडिया को न महंगाई दिखती है, न बेरोज़गारी दिखती है, न बदहाल अर्थव्यवस्था! क्यों दिखे? ये तो सब माया है और 'माया महा ठगिनि हम जानी'!
सच कहा है कि असली भक्त को अपने प्रभु के अलावा और कुछ नहीं दिखाई देता- भक्त वही है जो अपने भगवान के अलावा दूसरी बात मन में न आने दे और अपने प्रभु की नित्य लीला में मन को रमाता रहे!
कमाल का उलटफेर हैः हिंदी साहित्य तो भक्तिकाल से आधुनिक काल में आया, लेकिन अपना मीडिया आधुनिक काल से पलटी मार कर भक्तिकाल में लौट गया है!
यह है नव्य भारत का नव्य पत्रकार- सुबह से 'नवधा भक्ति' साधने में लग जाता है- नवधा भक्ति बड़ी ही अदभुत भक्ति है!
भक्त को सिर्फ़ इतना करना होता है कि वह आठों प्रहर अपने को 'दीन' समझे, अपने अहंकार का विलय कर दे, अपने प्रिय प्रभु के दर्शनमात्र से ही स्वयं को भयभीत होता दिखाए और अंत में इष्ट के साथ सेल्फ़ी लेकर फ़ेसबुक पेज पर डाल कर गर्वीला महसूस करे.
जब उसका कोई रक़ीब पूछे कि मेरे पास पत्रकारिता है और मेरे आदर्श 'पराडकर' और 'गणेशशंकर विद्यार्थी' हैं, तुम्हारे पास क्या है? तो गर्व से बोले कि मेरे पास मेरे प्रभु की सेल्फ़ी है!
जिसके पास उसके प्रभु के साथ सेल्फ़ी है वही असली पत्रकार है बाकी सब बेकार है!

Tuesday, 13 June 2017

संघर्ष की मुनादी के लिये 72 बरस के बूढ़े का इंतजार

https://www.facebook.com/yashnur.rajveer 
खलक खुदा का, मुलुक बाश्शा का 
हुकुम शहर कोतवाल का... 
हर खासो-आम को आगह किया जाता है 
कि खबरदार रहें 
और अपने-अपने किवाड़ों को अन्दर से 
कुंडी चढा़कर बन्द कर लें 
गिरा लें खिड़कियों के परदे 
और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें 
क्योंकि , एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी अपनी काँपती कमजोर आवाज में 
सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है ! 

धर्मवीर भारती ने मुनादी नाम से ये कविता नंवबर 1974 में जयप्रकाश नारायण को लेकर तब लिखी जब इंदिरा गांधी के दमन के सामने जेपी ने झुकने से इंकार कर दिया । जेपी इंदिरा गांधी के करप्शन और तानाशाही के खिलाफ सड़क से आंदोलन की अगुवाई कर रहे थे । 

और संयोग देखिये या कहे विडंबना देखिये कि 43 बरस पहले 5 जून 1974 को जेपी ने इंदिरा गांधी के खिलाफ संपूर्ण क्रांति का नारा दिया । और 5 जून 2017 को ही दिल्ली ने हालात पलटते देखे । 
5 जून को ही इंदिरा गांधी की तर्ज पर मौजूदा सरकार ने निशाने मीडिया को लिया । सीबीआई ने मीडिया समूह एनडीटीवी के प्रमोटरो के घर-दफ्तर पर छापा मारा । और 5 जून को ही संपूर्ण क्रांति दिवस के मौके पर दिल्ली में जब जेपी के अनुयायी जुटे तो उन्हे जगह और कही नहीं बल्कि इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र में मिली । यानी जिस दौर में जेपी के आंदोलन से निकले छात्र नेता ही सत्ता संभाल रहे हैं, उस वक्त भी दिल्ली में जेपी के लिये कोई इमारत कोई कार्यक्रम लायक हाल नहीं है जहा जेपी पर कार्यक्रम हो सके । तो जेपी का कार्यक्रम उसी इमारत में हुआ जो इंदिरा गांधी के नाम पर है ।
और जो सरकार या नेता अपने ईमानदार और सरोकार पंसद होने का सबूत इंदिरा के आपातकाल का जिक्र कर देते है । उसी सरकार , उन्हीं नेताओं ने भी खुद को इंदिरा गांधी की तर्ज पर खडा करने में कोई हिचक नहीं दिखायी । तो इमरजेन्सी को लोकतंत्र पर काला धब्बा मान कर जो सरकार मीडिया पर नकेल कसने निकली उसने खुद को ही जब इंदिरा के सामानातंर खडा कर लिया तो क्या ये मान लिया जाये कि मौजूदा वक्त ने सिर्फ इमरजेन्सी की सोच को परिवर्तित कर दिया है । उसकी परिभाषा बदल दी है । हालात उसी दिशा में जा रहे हैं? ये सवाल इसलिये क्योंकि इंदिरा ने तो इमरजेन्सी के लिये बकायदा राष्ट्रपति से दस्तावेज पर हस्ताक्षर करवाये थे ।
लेकिन मौजूदा वक्त में कोई दस्तावेज नहीं है । राष्ट्रपति के कोई हस्ताक्षर नहीं है । सिर्फ संस्थानों ने कानून या संविधान के अनुसार काम करना बंद कर दिया है । सत्ता की निगाहबानी में तमाम संस्धान काम कर रहे है । तो इससे बडी विडंबना और क्या हो सकती है कि जेपी का नाम भी लेंगे । और जेपी के संघर्ष के खिलाफ भी खड़े होंगे । इंदिरा का विरोध भी करेंगे और इंदिरा के रास्ते पर भी चलेंगे । दरअसल संघर्ष के दौर में जेपी के साथ खडे लोगों के बीच सत्ता की लकीर खिंच चुकी है । क्योंकि एक तरफ वैसे है जो सत्ताधारी हो चुके है और सत्ता के लिये चारदिवारी बनाने के लिये अपने एजेंडे के साथ है तो दूसरी तरफ वैसे है जो सत्ता से दूर है और उन्हे लगता है सत्ता जेपी के संघर्ष का पर्याय नहीं था बल्कि क्रांति सतत प्रक्रिया है। इसीलिये दूसरी तरफ खड़े जेपी के लोगों में गुस्सा है। संपूर्ण क्रांति दिवस पर जेपी को याद करने पहुंचे कुलदीप नैयर हो या वेदप्रताप वैदिक दोनो ने माना कि मौजूदा सत्ता जेपी की लकीर को मिटा कर आगे बढ रही है। वहीं दूसरी तरफ मीडिया पर हमले को लेकर दिल्ली के प्रेस क्लब में 9 जून को जुटे पत्रकारो के बीच जब अगुवाई करने बुजुर्ग पत्रकारों की टीम सामने आई तो कई सवालों ने जन्म दे दिया। मसलन निहाल सिंह , एचके दुआ, अरुण शौरी , कुलदीप नैयर , पाली नरीमन सरीखे पत्रकारों, वकील जो जेपी के दौर में संघर्षशील थे उन्होंने मौजूदा वक्त के एहसास तले 70-80 के दशक को याद कर तब के सत्ताधारियों से लेकर इमरजेन्सी और प्रेस बिल को याद कर लिया तो लगा ऐसे ही जैसे सिर्फ धर्मवीर भारती की कमी है,जो मुनादी लिख दें । तो देश में नारा लगने लगे कि सिंहासन खाली करो की जनता आती है । लेकिन ना तो इंदिरा गांधी कला केन्द्र में संपूर्ण क्रांति दिवस के जरीय जेपी को याद करते हुये और ना ही प्रेस क्लब में अभिव्यक्ति की आजादी के सवाल भागेदारी के लिये जुटे पत्रकारो को देखकर कही लगा कि वाकई संघर्ष का माद्दा कहीं है क्योकि सिर्फ मौजूदगी संघर्ष जन्म नहीं देती । संघर्ष वह दृश्टी देती है जिसे 72 बरस की उम्र में जेपी ने संघर्ष वाहिनी से लेकर तमाम युवाओ को ही सडक पर खडा कर उन्ही के हाथ संघर्ष की मशाल थमा दी । और मशाल थामने वालो ने माना कि कोई गलत रास्ता पकडेंगे तो जेपी रास्ता दिखाने के लिये है ।
लेकिन मौजूदा वक्त का सब बडा सच संघर्ष ना कर मशाल थामने की वह होड है जो सत्ता से सौदेबाजी करते हुये दिके और सत्ता जब अनुकुल हो जाये तो उसकी छांव तले अभिव्यक्ति की आजादी के नारे भी लगा लें । और इंदिरा गांधी कला केन्द्र के कमान भी संभाल लें । अंतर दोनों में नहीं है । एक तरफ इंदिरा गांधी कला केन्द्र में जेपी का समारोह करा कर खुश हुआ जा सकता है कि चलो कल तक जहा सिर्फ नेहरु से लेकर राजीव गांधी के गुण गाये जाते थे अब उस इमारत में जेपी का भूत भी घुस चुका है । और प्रेस क्लब में पत्रकारो का जमावडे को जेखकर खुश हुआ जा सकता है चलो सत्ता के खिलाफ संघर्ष की कोई मुनादी सुनाई तो दी । वाकई ये खुश होने वाला ही माहौल है । संघर्ष करने वाला नहीं । क्योकि जेपी के अनुयायी हो मीडिया घराने संभाले मालिकान दोनो अपने अपने दायरे में सत्ताधारी है । और सत्ताधारियो का टकराव तभी होता है जब किसी एक की सत्ता डोलती है या दूसरे की सत्ता पहले वाले के सत्ता के लिए खतरे की मुनादी करना लगती है । लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं कि सत्ता इमानदार हो गई है । या सत्ता सरोकार की भाषा सीख गई है । ये खुद में ही जेपी और खुद में ही इंदिरा को बनाये रखने का ऐसा हुनर है जिसके साये में कोई संघर्ष पनप ही नहीं सकता है । क्योकि दोनो तरफ के हालातो को ही परख लें । मसलन जेपी के सत्तादारी अनुनायियो की फेहरिस्त को परखे तो आपके जहन में सवाल उटेगा चलो अच्छा ही किया जो जेपी के संघर्ष में इनके साथ खडे नहीं हुए । लालू यादव, रामविलास पासवान , राजनाथ सिंह , रविशंकर प्रसाद , नीतीश कुमार से लेकर नरेन्द्र मोदी ही नहीं बल्कि मौजूदा केन्द्र में दर्जनों मंत्री और बिहार-यूपी और गुजरात में मंत्रियो की लंबी फेरहिस्त मिल जायेगी जो खुद को जेपी का अनुनायी । उनके संघर्ष में साथ खडे होने की बात कहेगे । और दूसरी तरफ जो मीडिया समूह घरानो में खुद को तब्दील कर चुके है वह भी इंदिरा के आपातकाल के खिलाफ संघर्ष करने के अनकहे किस्से लेकर मीडिया मंडी में घुमते हुये नजर आ जायेंगे । बीजेपी के तौर तरीके इंदिरा के रास्ते पर नजर आ सकते है और काग्रेस का संघर्ष बीजेपी के इंदिराकरण के विरोध दिखायी भी दे सकता है ।
इंदिरा का राष्ट्रवाद संस्थानों के राष्ट्रीकरण में छुपा था । मौजूदा सत्ता का राष्ट्रवाद निजीकरण में छुपा है । इंदिरा के दौर में मीडिया को रेंगने कहा गया तो वह लेट गया और मौजूदा वक्त में मीडिया को साथ खडे होने कहा जा रहा है तो वह नतमस्तक है । इंदिरा के दौर में मीडिया की साख ने मीडिया घरानो को बडा नहीं किया था । लेकिन मौजूदा दौर में पूंजी ने मीडिया को विस्तार दिया है उसकी सत्ता को स्थापित किया है । इंदिरा गांधी के सामने सत्ता के जरीये देश की राजनीति को मुठ्ठी में करने की चुनौती थी । मौजूदैा वक्त में सत्ता के सामने पूंजी के जरीये देश के लोगो को अपने राजनीति एजेंडे तले लाने की चुनौती है । तब करप्शन का सवाल था । तानाशाही का सवाल था । अब राजनीति एजेंडे को देश के एजेंडे में बदलने का सवाल है। सत्ता को ही देश बनाने- मनवाने का सवाल है । तब देश में सत्ता के खिलाफ लोगो की एकजुटता ही संघर्ष की मुनादी थी । अब सत्ता के खिलाफ पूंजी की एकजूटता ही सत्ता बदलाव की मुनादी होती है । इसीलिये मनमोहन सिंह को गवर्नेंस पाठ कॉरपोरेट घराने पढाने से नहीं चुकते । 2011-12 में देश के 21 कॉरपोरेट बकायदा पत्र लिखकर सत्ता को चुनौती देते है । और मौजूदा वक्त में कारपोरेट की इसी ताकत को सत्ता अपने चहेते कॉरपोरेट में समेटने के लिये प्रयासरत है । तो लडाई है किसके खिलाफ । लड़ा किससे जाये । किसके साथ खड़ा हुआ जाये । इस सवाल को पूंजी की सत्ता ने इस लील लिया है कि कोई संपादक भी किसी को सत्ताधारी का दलाल नजर आ सकता है । और कोई सत्ताधारी भी कारपोरेट का दलाल नजर आ सकता है। लोकतंत्र की परिभाषा वोटतंत्र में इस तरह जा सिमटी है कि जितने वाले को ये गुमान होता है कि चुनावी जीत सिर्फ राजनीतिक दल की जीत नहीं बल्कि देश जीतना हो चुका है और उसकी मनमर्जी से ही अब लोकतंत्र का हर पहिया घूमना चाहिये । और लोकतंत्र के हर पहिये को लगने लगा है कि राजनीतिक सत्ता से आगे फिर वही वोटतंत्र है जिसपर राजनीतिक सत्ता खड़ी है तो वह करे क्या । ये ठीक वैसे ही है जैसे एक वक्त राडिया टेप सिस्टम था । एक वक्त संस्थानो को खत्म करना सिस्टम है । एक वक्त बाजार से सबकुछ खरीदने की ताकत विकास था । एक वक्त खाने-जीने को तय करना विकास है । एक वक्त मरते किसानों के बदले सेंसेक्स को बताना ही विकास था । एक वक्त किसान-मजदूरो में ही विकास खोजना है । सिर्फ राजनीतिक सत्ता ने ही नहीं हर तरह की सत्ता ने मौजूदा दौर में सच है क्या । ठीक है क्या । संविधान के मायने क्या है । कानून का मतलब होना क्या चाहिये । आजादी शब्द का मतलब हो क्या । भ्रम पैदा किया और उस भ्रम को ही सच बताने का काम सियासत करने लगी । इसी के सामानांतर अगर मीडिया की स्तात को समझे तो राजनीतिक सत्ता या कहे राजनीतिक पूंजी का सिस्टम उसके जरुरत बना दी गई । प्रेस क्लब में अरुण शौरी इंदिरा-राजीव गांधी के दौर को याद कर ये बताते है कि कैसे अखबारो ने तब सत्ता का बायकट किया । प्रेस बिल के दौर में जिस नेता-मंत्री ने कहा कि वह प्रेस बिल के साथ है तो उसकी प्रेस कान्फ्रेस से पत्रकारो ने उठकर जाने का रास्ता अपनाया । लेकिन प्रेस क्लब में जुटे मीडिया कर्मीयो में जब टीवी पत्रकारों के हुजूम को देखा तो ये सवाल जहन में आया । कि क्या बिना नेता-मंत्री के टीवी न्यूज चल सकती है । क्या नेताओं-मंत्रियों का बायकॉट कर चैनल चलाये जा सकते हैं। क्या सिर्फ मुद्दों के आसरे , खुद को जनता की जरुरतो से जोडकर खबरो को परोसा जा सकता है । जी हो सकता है ।
लेकिन पहली लड़ाई संस्थानों को बचाने की लड़नी होगी । फिर चुनावी राजनीति को ही लोकतंत्र मानने से बचना होगा । पूंजी पर टिके सिस्टम को नकारने का हुनर सिखना होगा । जब सरकार से लेकर नेताओं के स्पासंर मौजूद है तो प्रचार के भोंपू के तौर पर टीवी न्यूज चैनलों के आसरे कौन सी लडाई कौन लडेगा । जेपी की याद तारिखो में सिमटाकर इंदिरा कला केन्द्र अमर है तो दूसरी तरफ प्रेस कल्ब में इंदिरा की इमरजेन्सी को याद कर संघर्ष का रईस मिजाज भी जिवित है । 
मनाईये सिर्फ इतना कि जब मुनादी हो तब धर्मवीर भारती की कविता ' मुनादी ' के शब्द याद रहे......
बेताब मत हो / तुम्हें जलसा-जुलूस, हल्ला-गूल्ला, भीड़-भड़क्के का शौक है 
बादश्शा को हमदर्दी है अपनी रियाया से / तुम्हारे इस शौक को पूरा करने के लिए 
बाश्शा के खास हुक्म से / उसका अपना दरबार जुलूस की शक्ल में निकलेगा 
दर्शन करो ! /वही रेलगाड़ियाँ तुम्हें मुफ्त लाद कर लाएँगी / बैलगाड़ी वालों को दोहरी बख्शीश मिलेगी 
ट्रकों को झण्डियों से सजाया जाएगा /नुक्कड़ नुक्कड़ पर प्याऊ बैठाया जाएगा 
और जो पानी माँगेगा उसे इत्र-बसा शर्बत पेश किया जाएगा / लाखों की तादाद में शामिल हो उस जुलूस में 
और सड़क पर पैर घिसते हुए चलो / ताकि वह खून जो इस बुड्ढे की वजह से 
बहा, वह पुँछ जाए ! / बाश्शा सलामत को खूनखराबा पसन्द नहीं !.

Saturday, 14 January 2017

दिल्ली की बंदर छाप पार्टी - AAP


Rs. 16 Lakh A Day Is What AAP Spends On Advertisements
The Aam Aadmi Party government is spending Rs. 16 lakh a day on advertising in the print media, a reply to an RTI inquiry has revealed.

The reply says over the last 91 days, the Delhi government has spent Rs. 14.45 crore on advertising - excluding broadcast. The list of publications which have received money from the Delhi government includes three Malayali and one Kannada newspaper -- popular in Kerala and Karnataka.

The government says the advertisements were aimed at spreading awareness about public policies. In a reply to Lok Sabha, AAP admitted to spending around Rs. 5 crore for publicising the two rounds of the odd-even scheme, implemented for 15 days each in January and April.

The RTI was filed by advocate Aman Panwar of the Congress party, which had been criticised for spending Rs. 23 crore in 2010 during the Commonwealth Games under the Sheila Dikshit government.

The AAP government has spent Rs. 80 crore in its first year in power. Last year, it was criticised for allocating Rs. 500 crore for advertisements in the state budget.

This year, the Congress filed a case in court, alleging that a chunk of the advertising money was spent on media blitz as the AAP completed its first year in power.

The petition had alleged that a large number of the advertisements were published or broadcast in towns and cities across India. "These outstation ads are of no use to the Delhi taxpayers or for the residents of towns and cities like Chennai, Hyderabad, Bengaluru etc," the petition had said.

Meanwhile, Delhi Congress chief Ajay Maken slammed the AAP government and said,"On one hand we don't have money to pay to 'safai karmacharis' for salaries. On one hand we don't have money to pay for pensions. On the other hand, they are spending more than the previous year on their self-publicity."

Thursday, 5 January 2017

In the course of David Coleman Headley's Testimony

One, Ishrat Jahan, and others killed with her, definitely had serious terror, most likely Lashkar-e-Taiba (LeT), links. 

Two, they were killed in a staged encounter where the Intelligence Bureau (IB) and Gujarat Police worked together. 


First, his claims count for nothing. He is a convict, a double agent who saved his life with a plea bargain in America and in Indian law, by securing a Terrorist and Disruptive Activities (Prevention) Act (Tada) court pardon. His claims on Ishrat are just a way of paying back the National Democratic Alliance for the pardon. There is, therefore, no change in their original belief that Ishrat was innocent, killed in a fake encounter.

Three contentious arguments rage after David Headley's claims, on oath now:
 

Second, that there is ample evidence now that Ishrat was a member of an LeT gang on the prowl and if the police put them away, where is the problem? You need to fight terrorists pro-actively. Killing terrorists any which way is perfectly fine, in fact, desirable. You must break the terrorists' morale.

Third, and which is now emerging as the civil libertarians' tactical retreat position is, so what if they were terrorists? It doesn't sanctify a fake encounter. All three have weight, but are flawed, on fact and morality. The answers are complex, not TV-debate friendly.

Meantime judicial activism took the hot seat and  it had a dual purpose, nailing the key political rivals, as also exploiting Muslim victimhood electorally. Politicians can deny it forever, but this was pure politics.

The UPA appointed its first IB director within weeks of taking over power in May, 2004, also appointed the next one as formidable and familiar as Ajit Doval. The IB was directly controlled then by M K Narayanan, and continued to be so for almost a decade. There isn't a better known, respected and admired officer in the IB than Mr Narayanan and frankly we haven't heard him call Ishrat innocent, the encounter fake or support the prosecution of IB's Gujarat head, Joint-Director (equivalent to Inspector General of Police) Rajinder Kumar. 

In fact, when the encounter returned to the headlines with the intervention of the courts and the UPA decided - at the top political levels - to also arraign Mr Kumar, the first time a senior IB officer was to be tried like this and the inner workings of the organisation exposed, it evoked consternation in security circles. The senior-most officers, including many respected veterans, protested quietly, and reasoned that this was a perilous course - and that such encounters were routine, always had bipartisan politician support and should just not be politicised now, whatever the compulsions. But politics had now fully taken over in all its most awful dimensions. At one level it became a Central Bureau of Investigation-versus-IB war. 

The silliest argument being made is that the BJP pardoned David Headley and his claims on Ishrat are a part of the deal. Deal-making over David Headley started very much in the UPA times. If in doubt, see leaked cables from the then US ambassador Tim Roemer on his conversation with Mr Narayanan (wikileaks.org), who says India can't be seen to be giving up an extradition demand, but won't press right now. Mr Roemer of course points out that in US law once a man is convicted, extradition is not possible until the sentence - in this case 35 years - is over. So the Indian pardon is a formality.

The civil libertarians have a better case, particularly those saying so what, even if she was a terrorist. No law justifies fake encounters. This is an indisputable truism. The BJP argument that you can kill terrorists in any manner you choose is morally flawed and legally wrong. My question: can you call Ishrat's a fake encounter?

Besides the extremes of fake, and genuine encounters (as certainly Batla House) , there is a third and more prolific category. Intelligence people invent euphemisms for the most awful things. For this they have "controlled killings". From James Bond's Licence to Kill, to the American drones massacring "terrorists" around the world, the democratic state has given itself the mostly illegal right to take life without trial - but legally. Even the Americans have now done this having the president approve every such killing, including, notably, of the odd American citizen (Anwar al-Awlaki in Yemen). When the Ishrat controversy was raging and commended I gone through the New York Times CIA reporter Mark Mazzetti's stellar The Way of the Knife on how the CIA had from an intelligence agency become a killing machine protected through a legal framework. 

The Ishrat encounter was neither genuine, nor fake. I believe it was a "controlled killing". If more such will be inevitable as the terror threat grows, you need to design a legal framework, as Washington has done. Or be like Scandinavia. You can't stop at Ishrat either. Nobody can be selective in outrage.

















UP : Why AAP nowhere ?

इसके दो कारण हैं. 
पहला तो ये कि 'आप' उन्हीं जगहों पर गई है, जहां कांग्रेस और बीजेपी का सीधा मुकाबला है. कांग्रेस चूंकि देश भर में कमजोर हो रही है और 'आप' को ये लगता है कि वह इसकी ख़ाली की गई जगह को भर सकती है.
हर जगह वह कांग्रेस के बजाय खुद बीजेपी के साथ सीधे मुक़ाबले में आना चाहती है. दूसरी बात बजट से भी जुड़ी हुई है. आम आदमी पार्टी के पास बजट की भी कमी है.
वह गोवा, पंजाब या हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे राज्यों में तो लड़ सकती है लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में जहां 403 सीटें हैं और हर सीट पर चुनाव लड़ने के लिए बड़े बजट की ज़रूरत होती है.
चूंकि दूसरी पार्टियां ज्यादा खर्च करेंगी और 'आप' उस मुक़ाबले खर्च न कर पाए तो दिखाई भी नहीं देगी. ये दो बड़े कारण हैं जिनकी वजह से आम आदमी पार्टी सिर्फ उन्हीं राज्यों में जा रही हैं जहां पर बीजेपी और कांग्रेस सीधी लड़ाई में हैं.
उत्तर प्रदेश में बहुकोणीय मुकाबला है. एक कारण यह भी है कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में जातीय पार्टियों का असर है. इन राज्यों में चुनाव लड़ने में ख़र्च ज्यादा है. गोवा और पंजाब जैसे राज्यों में सीटें कम हैं.
यहाँ कांग्रेस और बीजेपी का आमने-सामने का मुक़ाबला है. इन जगहों पर आम आदमी पार्टी चुनावी मैदान में उतरकर कांग्रेस की जगह लेना चाहती है. नतीजे में चाहे बीजेपी की जीत हो तो उसे प्रमुख विपक्षी पार्टी की जगह मिलेगी. यही उसकी रणनीति है.
लेकिन इन सबके बीच ये सवाल रह ही जाता है कि जो राजनीतिक मैनिफ़ेस्टो पंजाब और गोवा में चल सकता है, वह उत्तर प्रदेश में क्यों नहीं. ये नहीं भूलना चाहिए कि लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की बहुत बुरी हार हुई थी.
हालांकि दिल्ली के चुनाव के बाद केजरीवाल ने इसे गलती माना था. इस हार के बाद पार्टी को ये एहसास हुआ कि लोकसभा चुनावों में 100 संभावित सीटों पर ज्यादा ध्यान दिया जाता तो बेहतर नतीजे मिलते.
इसलिए आम आदमी पार्टी चाहती है वह एक-एक करके राज्यों में अपना विस्तार करे और संसाधनों का समझदारी से इस्तेमाल करे. उनका मानना है कि पंजाब के बाद आम आदमी पार्टी की पूरी टीम हिमाचल में शिफ्ट हो जाएगी.
हिमाचल पड़ोसी राज्य है, उतना ही छोटा है और उसकी चुनौतियां भी कमोबेश वैसी ही हैं. जहां तक राजनीतिक शुचिता और ईमानदारी को लेकर किए जाने वाले दावों की बात है, उसे लेकर बहुत विवाद है.
हरेक आदमी और राजनीतिक पार्टी ख़ुद को अच्छा ही बताते हैं. लेकिन दिल्ली में उनके कामकाज को लेकर बड़े प्रश्नचिह्न लग रहे हैं. चूंकि दिल्ली में वे लेफ्टिनेंट गवर्नर के अधीन हैं, उनका कहना है कि वे अपने तरीके से सरकार नहीं चला सकते.
अगर वे पंजाब या गोवा किसी एक जगह पर चुनाव जीतते हैं और स्वतंत्र रूप से सरकार चला पाते हैं तो वे पूरे देश को दिखा पाएंगे कि हमने कुछ किया है. उत्तर प्रदेश में जगह बनाने के लिए उन्हें अपना काम करके दिखाना होगा और दिल्ली में वे कुछ कर नहीं पा रहे हैं.

Saturday, 17 December 2016

Do's & dont's for sting operations drafted

Against the background of some sensational sting operations by the media, an official committee has drafted a comprehensive set of guidelines contemplating a series of do's and don'ts for the broadcast media under which media persons should identify themselves to potential targets when undertaking such an operation.
The Broadcasting Code and Guidelines, drafted by a sub-committee constituted by the Information and Broadcasting Ministry, has a separate chapter on news and current affairs that deals in detail on how broadcast journalists should go about their work, including sting operations. The draft seeks to replace the age-old Programme and Advertising Code.
Emphasising that infringement of privacy in a news based/related programme is important, the guidelines specify that where the media carries out a sting operation, it should be able to justify its undercover operation as 'warranted' in public interest.
A section titled 'Privacy' elaborates how a broadcasting service provider should avoid any 'unwarranted infringement of privacy' in news-based programmes and while obtaining material for such programmes.
It spells out a 16-point do's and dont's for the media, making it clear that channels must not use material relating to 'persons personal or private affair or which invades an individuals privacy unless there is an identifiable public interest reason for the material to be broadcast.' It specifies that any infringement of privacy in this connection must be warranted.
Delving into the term warranted, the draft guidelines say: "It means that where the licensee wishes to justify an infringement as warranted, it should be able to demonstrate why in particular circumstances of the case it is warranted."
The draft guidelines propose that a broadcaster can record telephone calls with another party if it has, from the outset of the call, identified itself, explained the purpose of the call and also that it is being recorded for possible broadcast unless it is warranted not to do one or more of these practices.
"If at a later stage it becomes clear that a call that has been recorded will be broadcast (but this was not explained to the other party at the time of the call), then the BSP must obtain consent before broadcast from the party, unless it is warranted not to do so," the guidelines propose.
The code says any infringement of privacy in the making of a news based/related programme should be with the person's and/or organisation's consent or be otherwise warranted.
"If the broadcast of a news-based/related programme would infringe upon the privacy of a person or organisation, consent should be obtained before the relevant programme is broadcast, unless the infringement of privacy is warranted. "If an individual or organisation's privacy is being infringed, and they ask that the filming, recording, or live broadcast be stopped, the BSP should do so, unless it is warranted to continue," the draft says.
It says legitimate expectations of privacy will vary according to the place and nature of the information, activity or condition in question, the extent to which it is in the public domain (if at all) and whether the individual concerned is already in the public eye.
The draft guidelines note that damage or injustice resulting from news and current affairs contents of TV cannot be undone post facto. "Hence, there is a need for having deliberate and transparent guidelines and standards for news programming that need to be followed scrupulously by all," it says.
The preamble to the draft code and guidelines states that a need had been felt to regulate the content going into public domain to ensure conformity with acceptable contemporary community standards and to protect the vulnerable sections from harmful and undesirable content on TV.
It said the code had been drafted to introduce greater specificity and detail with a view to facilitate self-regulation by the broadcasting industry and minimize scope for subjective description by regulatory authorities/government. The basic underlining principle of this code is that the responsibility of complying with the provisions vests with the broadcasting service provider, the preamble says.

Sunday, 27 November 2016

डिज़ाइनर आँसू



उड़नखटोले वाले प्राचारक पहले ये तय कर लें, हंसना है या रोना है. एक सड़कछाप रामलीला के क्लाकार को भी पता होता है स्टेज़ पर भाव भंगिमाएँ काफ़ी अहमियत रखती हैं, प्रचारक भी अपने शरीर पर जरूरत से ज्यादा ही ध्यान देता है लगता है जैसे किसी कबीले का सरदार किसी बड़े अनुष्ठान के लिए मेकअप करके आया हो. आँसू का प्रयोग किसलिए? क्यूँकि एक कमीनेपन से भरा नेता ये जानता है, आंसू नाटकीयता पैदा करते हैं, निकटता पैदा करते हैं, आँसू अपनेपन का आभास देते हैं और लगने लगता है कि यह तो हमारे जैसा ही है. आँसू दूरियों को पाटते हैं, भावनाओं को उकसाते हैं, पूरी घटना को निजी अनुभव में बदल देते हैं, फिर लोग कहते हैं, "आज हमारा पांडु रो पड़ा." 


ये ही काम शेक्सपियर की जूलियस सीजर मैं ब्रुटस नाम का किरदार करता है जो आखरी मैं जूलियस के ख़ात्मे के लिए जनता से बलिदान की माँग करता है ओर इसी तरह प्रचारक भी राष्ट्रहित ओर देशभक्ति के नारो के बीच आँसू बलिदानों की माँग करने लगता हैं. आँसुओं ने जो नाटकीयता पैदा की है उसका जवाब भी जनता नाटकीयता के साथ ही देती है, ये सब किसी सीधे-सादे भाषण से हासिल नहीं हो सकता.

आँसू पहले समूह बनाते हैं, फिर उनमें एकता का भाव जगाते हैं और फिर लोग आँसुओं का कर्ज़ उतारने में लग जाते हैं.अक्सर होने वाले शक्ति प्रदर्शन के बीच में कभी-कभी आँसू ऐसा दिखाते हैं जैसे महानायक ख़तरे में है, उसे मदद चाहिए. भले ही जनता का दिल भर आया है, अब आप कहते रहिए कि ये तो किसी घटिया हिंदी फ़िल्म सरीखी नाटकीयता है, लेकिन असली बात तो यही है कि हम सब बी-ग्रेड हिंदी फ़िल्मों की भारी खुराक पर पले हैं.जब पिक्चर हिट है तो क्रिटिक कुछ भी कहते रहें. प्रचारक मनोविज्ञान के आचार्य हैं, मैं जिसे 'डिज़ाइनर आँसू' समझता हूँ, दूसरे लोगों के लिए वो गंगा की तरह निर्मल और पवित्र हैं. वीर और करुण रस का अदुभुत संगम नोटबंदी को कामयाब बना सकता है, रोकर वे लोगों की तकलीफ़ों की बात नहीं कर रहे हैं, त्याग और समर्पण की माँग कर रहे हैं. उनकी इस अदाकारी को सलाम, काश लोग याद रख पाते कि अदाकारी से देश और दुनिया नहीं चलती.

Monday, 21 November 2016

Government takes a great leap backwards

In 1958, Chairman Mao ordered that that all sparrows over China should be put to death. It was hailed as a necessary step by a strong leader.Farmers were suffering because sparrows tended to eat their grain seeds. Thus began The Great Sparrow Campaign. A countless number of sparrows were indeed wiped out -but there were unintended consequences. Sparrows ate locusts, and once the balance in the ecosystem changed, locusts proliferated and destroyed China's crops. There was famine, hunger, starvation: no less than 45 million people died in the three years following Mao's orders.At the start, Mao exhorted them to bear with the inconvenience. But then the pain piled up. Mao's infamous Great Leap Forward included plenty of edicts besides the death warrant to sparrows.They all stemmed from the delusion that the leader of a country could redesign an entire society to conform to a master plan. The 20th century is full of cautionary tales that warn against such delusion such as the communism of Mao and Stalin, and the fascism of Hitler.Yet, we do not learn. Narendra Modi's demonetisation of old 1000 and 500 rupee notes is one such folly, a blunder in every imaginable way. It doesn't achieve its intended purpose. And its unintended consequences could devastate the lives of the poor, and cripple our economy . 

Modi claims that this move is an attack against black money and corruption. This is not true, and here are four reasons why. One, as per a recent estimate, only 6% of black money is kept in the form of cash.Two, new 2000 and 500 rupee notes are on the way , and a black market for conversion from old to new is already thriving. Three, as various economists have pointed out, this attacks the stock and not the flow of black money . To strike at black money and corruption, you need to strike at their root causes. 

Corruption and black money are a consequence of big government, of one set of individuals having discretionary powers over the actions of others. If Modi was serious about tackling black money, he'd bring about institutional changes that would take us towards the minimum government he had promised in his 2014 campaign. Instead, government keeps getting bigger, controlling more and more of our lives. More government = more corruption. 

The fourth and most compelling reason is this: these aren't really high-denomination notes. Modi has probably not bought anything from a store in 15 years, so he imagines that the poor do not use these notes. Well, consider that the last time demonetisation took place in 1978, a 1,000 rupee note, in terms of purchasing power, could buy goods worth Rs 12,000 today . Rich people did hoard their black money with it, but the poor did not use them. A 500 rupee note today , by contrast, is the equivalent of a 50 rupee note in 1978. These notes constitute 85% of the money in circulation, as opposed to 0.6 in 1978. Over 90% of the transactions in India are cash transactions, and more than 90% of the cash in India is not black money . 

This is why the consequences of Modi's move are so severe. According to an RBI note from March this year, only 53% of Indians have bank accounts. How do you think the other 600 million store their savings? Over 300 million people have no government ID, and there are crores of people stuck without a way to convert their hard-earned cash. Even if they did have accounts, there are reports that the government will take six months to print enough replacement notes. Every day the death toll goes up, but rural suffering and anger cannot be captured by bare numbers.

Apart from all the individual suffering, our economy is being eviscerated. Cash is integral to most of the economy . Farmers are unable to sell perishable produce, to buy grains for the new harvest or to pay labourers. Transporters are unable to transport goods across distances. Commerce has shut down in many places, with small businesses going bust. In some places, the barter system is back, as if we've gone centuries back in time. 

Even if implementation was perfect,this would be a historic blunder because social engineering never works, and carries moral costs because of its unintended consequences. When people have to queue up to withdraw their own money , on which limits are placed, it is an attack on property rights that is more out of the Communist handbook than any right-wing philosophy . Indeed, Burkean conservatives and Hayekian libertarians alike would be aghast at Modi's actions, as he propels India towards the Soviet Union so admired by Nehru, with its state oppression, artificial shortages and infamous queues. But Chairman Mao would approve.

Sunday, 20 November 2016

जेटली फिर मोदी के राहु



हर सरकार अपने जन्म के साथ अपने पतन के चेहरे, चरित्र और बीज लिए होती है। नरेंद्र मोदी ने गलती की जो ईश्वरीय फैसले की अनदेखी की। आंधी के बीच भी अमृतसर में चुनाव हारे अरुण जेटली को नंबर दो बनाया। उन्हीं की सलाह से अपने कैबिनेट में बौने लोग भरे। अरुण जेटली ने भाजपा में जितने समझदार नेता थे, जितने भी मोदी के असली शुभचिंतक थे ( फिर भले अरुण शौरी, राम जेठमलानी, डा. सुब्रहमण्यम स्वामी आदि क्यों न) उन्हें दूर करवाया। निकम्मे-नाकारा अफसरों को वित्त मंत्रालय, सीबीडीटी आदि एजेंसियों में बैठाया। मोदी को उस अंग्रेजीदां मीडिया, और मीडियाकर्मियों के फेर में डाला जिन्होंने गुजरात के 12 साल में नरेंद्र मोदी-अमित शाह को धो-धो कर गालियां दी थी। उन्हें वैश्विक पैमाने का नरसंहारकर्ता बताया था।
अब वहीं अरुण जेटली फिर नरेंद्र मोदी के नोटबंदी फैसले में लोगों का हाहाकार बनवा देने वाला चेहरा प्रमाणित हैं। जेटली ने सरकार को आज उस मुकाम पर पहुंचा दिया है जहां संघ परिवार में चिंता से यह डायल़ॉग सुनाई दिया है कि मोदी कहीं भाजपा के बहादुरशाह जफर साबित न हों। सब इस चिंता में हैं कि यदि 3-4 महीनों में लोग तकलीफों में हाहाकार करते रहे और उसके असर में भाजपा यदि यूपी में हार गई तो 2019 तक क्या होगा।
अपन फिलहाल यूपी चुनाव नतीजे तक नहीं पहुंचे हैं। मगर इतना दिख रहा है कि नए नोटों की कमी के दस तरह के असर होंगे। इसके आगे अरुण जेटली की वित्त मंत्रालय, सुप्रीम कोर्ट की कानूनी कमान, बैंकिंग व्यवस्था सब फेल होगी। 8 नवंबर के बाद दुनिया ने देखा है और देख रही है कि बतौर वित्त मंत्री अरुण जेटली व उनके चहेते वित्त सचिव शक्तिकांत दास ऐसे जनता के सामने आए मानो पंजाबी चुटकलेबाजी करानी है। नोटबंदी के दूसरे दिन अरुण जेटली ने प्रेस कांफ्रेंस कर देश को यह चुटकला सुनाया कि मनरेगा से जब मजदूर, गरीब के खातों में पेमेंट जा रहा है तो चाय बागान के मजदूरों को नकदी में मजदूरी की चिंता की जरूरत नहीं है। व्यापारी, कारोबारी, मालिक लोग ऑनलाईन, चैक से लेन-देन करने की आदत बनाएं।
सोचें, कितनी मूर्खतापूर्ण बात। रिजर्व बैंक, सरकार जब खुद बताती है, माना जाता है कि देश के 80 प्रतिशत लोग नकदी में लेन-देन का व्यवहार करते हैं तो वित्त मंत्री का यह कहना किस बात का प्रमाण है कि अब चैक से पेमेंट करो।
यही नरेंद्र मोदी, अरुण जेटली, रिर्जव बैंक के गर्वनर उर्जित पटेल, वित्त मंत्रालय के अफसरों के हिसाब का नंबर एक ले डूबने वाला कोर बिंदु है। इन सबने माना कि जनधन खाते खुल गए हैं। 32 करोड़ गरीब लोग एकाउंटधारी हो गए हैं सो नोट बंद करेंगे तो सब चैक से, आनलाइन पैसा लेने-देने लगेंगे!
बहरहाल, अरुण जेटली कह सकते हैं कि नरेंद्र मोदी ने उन्हें 500, 1000 के नोट बंद करने की योजना में शरीक नहीं रखा। इसलिए फैसला उनका नहीं। वे जिम्मेदार नहीं। मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के बाद तो बतौर वित्त मंत्री उन्हें 48 घंटों में उपलब्ध आंकड़ों पर पूरा हिसाब बना कर क्रियान्वयन परफेक्ट बनवाना था। वित्त मंत्रालय, रिजर्व बैंक के अधिकारियों, बैकिंग व्यवस्था को 24 घंटे में से 16-18 घंटे दफ्तर में बैठ कर लीडरशिप देनी थी। पर हुआ क्या? पूरे देश में उनके और वित्त सचिव की बार-बार बदलती घोषणाओं, व्यवस्थाओं को ले कर गुस्सा है। चौतरफा दस तरह की अफवाहें हैं। क्या कभी यह कल्पना की जा सकती है कि वित्त सचिव आ कर ज्ञान दें कि यदि नोट की स्याही उतरी तो वह असली। दो हजार रु के नए नोट को ले कर अविश्वास है तो हजार का नया नोट आएगा या नहीं, इसकी अनिश्चितता भी। पिछले दस दिनों में वित्त मंत्रालय ने एक ऐसी ठोस विश्वास बनाने वाली बात नहीं की कि इस कायदे, व्यवस्था से फलां-फलां तारीख तक नोट बदली ऐसे होगी।
तभी ममता बनर्जी ने दहाड़ते हुए पूछा यह क्या सरकार है जो एक दिन कुछ कहती है और दूसरे दिन कुछ और!
जाहिर है घोषणा से ज्यादा यदि उस पर अमल, इम्पलीमेंट से हाहाकार मचा है तो सौ फीसद जिम्मेवार अरुण जेटली हैं मगर उनका चेहरा देखिए, उनके हाव-भाव पर गौर करें, ऐसा लगेगा मानो सब सामान्य है।
यही दिल्ली में बैठ कर राजनीति करने वालों की तासीर है। अरुण जेटली ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोनों पर दिल्ली के भाड़े के टीवी चैनलों, भांड अखबारों-मीडिया का वह काला जादू करवा दिया है कि ये सब हरा दिखवा भी रहे हैं और देख भी रहे हैं। सब मुगालते में हैं कि बैंकों के आगे लाईनें खत्म हो गई हैं। एटीएम काम करने लगे हैं। लोग काला धन खत्म होने का जश्न मना रहे हैं। कुछ वैसे ही जैसे अरुण जेटली ने अपने मुगालतों, मुंगेरीलाल के सपनों में मीडिया के ही सर्वे, मीडिया के ही मैनेजमेंट से हवा बनाई थी कि किरण बेदी हिट हैं। उनके नाम पर दिल्ली के लोग वाह, वाह कर रहे हैं लगभग वहीं एप्रोच नोटबंदी को ले कर बनवा दी है।
सो फिर मेरी इस बात को नोट करें कि हर सरकार अपने जन्म के साथ पतन का जिम्मेदार चेहरा लिए होती है। अरुण जेटली इस सरकार का, और खास कर नरेंद्र मोदी का वह कर देंगे जिसकी आप कल्पना नहीं कर सकते!

Wednesday, 9 November 2016

How BJP maligned Congress .............

Black money was made an issue in 2014 and just before the list was submitted in SC , BJP cell painted Congress black to take strategical lead. 

http://www.india.com/news/india/list-of-black-money-holders-in-swiss-bank-accounts-leaked-by-wikileaks-182160/

The list mentioned 
1- Ashok Gehlot (220000)
2- Rahul Gandhi (158000)
3- Harshad Mehta (135800)
4- Sharad Pawar (82000)
5- Ashok Chavan (76888)
6- Harish Rawat (75000)
7- Sonia Gandhi (56800)
8- Muthuvel Karunanidhi (35000)
9- Digvijay Singh (28900)
10- Kapil Sibal (28000)
11- Rajeev Gandhi (19800)
12- Palaniappan Chidambaram (15040)
13- Jayaram Jaylalitha (15000)
14- Kalanithi Maran (15000)
15- HD Kumarswamy (14500)
16- Ahmed Patel (9000)
17- J M Scindia (9000)
18- Ketan Parekh (8200)
19- Andimuthu Raja (7800)
20- Suresh Kalmadi (5900)

But fact didn't match the predictions...

http://indianexpress.com/article/india/india-others/top-100-hsbc-account-holders-with-indian-addresses/

Gujarat was leading in this ...........with names including Ambani brothers and no action taken yet.......


Uttamchandani Gopaldas Wadhumal, 
Mehta Rihan Harshad, 
Tharani Mahesh Thikamdas, 
Kothari Bhadrashyam Harshad, Shaunak Jitendra Parikh, 
Ambani Mukesh Dhirubhai, 
Ambani Anil, 
Mehta Ravichandra Vadilal, 
Patel Kanubhai Ashabhai, 
Sachiv Rajesh Mehta, 
Ravichandran Mehta Balkrishna, 
Kumudchandra Shantilal Mehta, 
Patel Rajeshkumar Govindlal, 
Anup Mehta, Salgoacar Dipti Dattaraj, 
Vaghela Balwantkumar Dullabhai, 
Dilipkumar Dalpatlal Mehta, Lakhani Jamna Thakurdas, Natvarlal Bhimbhai Desai, Thakkar Dilip Jayantilal, Patel Lalitaben Chimanbhai, Mehta Devaunshi Anoop, Dhirani Vikram, Chatwani Trikamji, Dipendu Bapalal Shah, Jasdanwalla Arshad Husain Adamsi, Jhaveri Harish Shantichand, Singhvi Ganpat, Milan Mehta, Modi Krishan Kumar, Patel Atul Thakorbhai, Shah Anil Pannalal, Bhaven Prematlal Jhaveri, Kinariwala Kalpesh Harshad, Shobha Bharat Kumar Asher, Bhansali Alkesh Pratap Chandra.

Sunday, 6 November 2016

SIMI Encounter & Biased Journalistic Coverage !

Selected media outlets called played police version without following ethical standards. 

FactsTwisted No1 – A specific prime time horror show channel claimed these eight escapees were "planning a major terror strike". Essentially mouthing what the MP Home Minister had said to the media earlier in the day, without offering any evidence to support the claim. But it suited Master’s narrative to take that at face value.

FactsTwisted No2 – Horror show master claimed that these eight escaped undertrials (will come back to this shortly) were "obviously a grave and serious threat to national security". How so, ring master? Because of that ‘major terror strike’ theory that you bought into?
An unsuspecting audience had already been supplied with two crucial bits of spurious ‘information’ to help colour their views on the encounter.

FactsTwisted No3 – How did ring master know these eight men had executed bomb blasts? Which Indian court has convicted them? Horror show player knew these eight men were undertrials. But he hid that from his audience. Does an unbiased journalist do that?


These eight SIMI members did face grave charges, including execution of bomb blasts and murder. But they had not been caught in the act like an Ajmal Kasab. So, theirs are not Kasab-style open-and-shut cases. Their guilt has to be proven in an Indian court of law. But in ring master's kangaroo court, convictions had already been handed out.

FactsTwisted No4 – In his Question No 1 itself, Ring Master dispensed with words like ‘suspects’ or ‘undertrials’, simply calling them ’terrorists’ who had carried out ‘bomb blasts’. He could do that since he had already declared them guilty.


Master’s next two questions were – Would the "usual suspects" have taken responsibility if the eight SIMI ’terrorists’ had conducted a major terror strike and killed hundreds of civilians? High on rhetoric, this question. But here’s a counter-question for Master – Would he take the responsibility for the murder of these eight men, if it was proven that this was a ‘fake encounter’? Would he take the responsibility for the murder of these eight men, if they were found ‘Not Guilty’ of the terror charges against them? I really wonder.

Master’s fourth question – What about the human rights of Constable Ramashankar Yadav, whose throat was allegedly slit by the eight SIMI men? Why does Master assume that Constable Yadav’s brutal killing hasn’t shocked someone who questions the encounter? Of course, it shocks us all. His killers must be brought to justice. But not summarily executed. And even if it bothers Master, I will say here that these eight men remain the alleged killers of Constable Yadav, until it is proven that they killed him.

Ironically, both Yadav and these eight men need the same evidence for justice to prevail – CCTV footage from inside the jail. For now, we’re told that at this high-security central Jail not one CCTV camera was in working order. And so, no footage exists of these eight men breaking out of their cell block, killing Constable Yadav and scaling the boundary wall using sheets and blankets. Convenient. And the Master who would normally pounce on such a glaring lie turns mysteriously gullible here.

In fact, it seems Master has ignored several inconsistencies in the ‘encounter’ story. Perhaps because he believes these men did deserve to be executed without trial by the Indian state. For him, SIMI = Islamic terror = punishable by death. No questions asked. If my cranky retired dad or some lout on the street swore by this form of mob justice, I’d perhaps understand. But this, coming from one of India’s foremost TV journalists, by far the most popular face on news channels, is scary.













Friday, 28 October 2016

समान नागरिक संहिता



काश! हम शाहबानो मामले में आरिफ मोहम्‍मद खान को सुन पाते!


एक सप्ताह के अंदर दो ऐसी छोटी-छोटी किन्तु बड़े प्रभाव छोड़ने वाली घटनाएं हुई हैं, जिनकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए. इनमें एक घटना यह है कि विधि आयोग ने देश के सभी सात राष्ट्रीय राजनीतिक तथा 49 क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को कुछ प्रश्‍न भेजकर उनसे समान नागरिक संहिता पर उनकी राय मांगी है. दूसरी घटना है प्रधानमंत्री का सार्वजनिक रूप से दिया गया यह बयान कि सरकार मुस्लिम महिलाओं को समानता का अधिकार दिलाने के मामले में कोई कसर नहीं छोड़ेगी.

यानी कि हम इसे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की कॉमन सिविल कोड के बारे में दी गई राय कह सकते हैं. देखते हैं कि शेष पार्टियां इस बारे में क्या सोचती हैं. वे सोचें चाहे जो भी, लेकिन इससे कम से कम इतना तो जरूर होगा कि पिछले 70 सालों से अधर में लटके हुए इस मुद्दे पर छोटे-बड़े सभी राजनीतिक दलों का स्‍टेंड पता चल जाएगा. तब भविष्य में उनके लिए इस मामले पर 'मेनुपुलेट' करना मुश्किल हो जाएगा. तब शायद इसका कोई एक हल निकल सकेगा.

दरअसल, यदि इसका हल निकल नहीं पा रहा है तो इसके लिए धार्मिक और सामाजिक संगठन उतने जिम्मेदार नहीं हैं, जितने कि राजनीतिक दल हैं. सच तो यह है कि सन् 1985 में कांग्रेस को अभी से कई गुना बेहतर मौका मिला था जब वह इस दिशा में एक बहुत बड़ा योगदान कर सकती थी. उसे करना भी कुछ विशेष नहीं था. उसके काम को सर्वोच्च न्यायालय (शाहबानो मामले में) ने कर दिया था. उसे केवल चुप भर रहना था. और उसके पक्ष में एक बड़ी बात यह भी थी कि उस समय मुस्लिमों के एक युवा नेता, जो गृह राज्यमंत्री भी थे, न्यायालय के पक्ष में थे और उन्होंने अपने इन विचारों को लोकसभा में खुलकर रखा भी था. उनका वह ऐतिहासिक भाषण किसी उत्साही युवा नेता द्वारा भावनाओं के प्रवाह में बहकर दिया गया राजनीतिक भाषण नहीं, बल्कि तथ्यों और तर्कों पर आधारित एक बौद्धिक विमर्श अधिक था.


आरिफ मोहम्मद खान ने अपना यह भाषण एम.बनातवाला द्वारा प्रस्तुत एक गैर-सरकारी विधेयक के विरोध में 23 अगस्त 1985 को लोकसभा में दिया था. यह घटना, जिसे एक ऐतिहासिक घटना के रूप में लिया जाना चाहिए, सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के ठीक तीन महीने बाद घटी थी. मुझे लगता है कि कम से कम वर्तमान युवा पीढ़ी को तो यह भाषण अवश्‍य ही उपलब्ध कराया जाना चाहिए ताकि वह तीन बार तलाक तथा बहु विवाह जैसी परम्पराओं की सच्चाई को जान सके.

अपने इस उद्बोधन की शुरुआत आरिफ साहब ने देश के प्रथम शिक्षा मंत्री तथा इस्लामिक कानूनों के आधिकारिक विद्वान (तर्जमा उल कुरान के लेखक) मौलाना आजाद के विचारों से की थी. मौलाना आजाद ने लिखा था कि कुरान के अनुसार किसी भी हालत में तलाकशुदा औरत की उचित व्यवस्था की ही जानी चाहिए. यह निर्देश इस आधार पर दिया गया है कि पुरुष की तुलना में औरत कमजोर होती है और उसके हितों की रक्षा की जानी चाहिए. इसी मूल विचार को पकड़ते हुए आरिफ साहब ने कहा था कि हम दबे हुए लोगों को ऊपर उठाकर ही यह कह सकेंगे कि हमने इस्लामिक सिद्धांतों का पालन किया है, और उनके साथ न्याय किया है. उन्होंने कई उद्वरणों द्वारा सिद्ध किया कि दरअसल कुरान परिवार को बचाने की हरसंभव कोषीष करता है।

बहुविवाह के बारे में कुरान (24.32) में स्पष्ट निर्देश  हैं कि ‘विवाह उससे करो, जो अकेला हो.’ यह निर्देश स्त्री और पुरुष दोनों के लिए है. हां, किसी असामान्य स्थिति में इस निर्देश के बाहर जाया जा सकता है. इसके लिए वे एक घटना का हवाला भी देते हैं.

घटना कुछ यूं है कि जब मक्का ने मदीने पर हमला बोला, उस समय मोहम्मद साहब अपने 300 अनुयायियों के साथ विस्‍थापन (हिजरत) पर थे. इनमें से 73 से भी अधिक लोग मारे जा चुके थे. दरअसल, उन्होंने उस असाधारण स्थिति की बात इन लोगों के परिवारों की मदद के लिए कही थी.

आरिफ मोहम्मद ने बताया कि तीन बार तलाक की बात उतनी सही नहीं है. सच यह कि मोहम्मद साहब के इंतकाल के कुछ सालों बाद जब तीन बार तलाक कहने को वैध बना दिया गया, तो उस समय इसको लागू करने वाले को 40 कोड़ों की सजा दी गई थी.

इन सबके साथ ही आरिफ साहब की यह बात काबिले गौर है, न केवल मुसलमानों के लिए ही, बल्कि सभी धर्मों और समुदायों के लिए कि ‘यदि तुम आगे नहीं बढ़ोगे, तो अल्लाह तुम्हें कड़ी सजा देंगे, और तुम्हारी जगह दूसरे लोगों को दे देंगे.’ (कुरान 9.39)